Tuesday, February 21, 2017

हिंदी के क्षेत्र में रोजगार अपार

यह कहना गलत होगा कि हिंदी के क्षेत्र में रोजगार कम हैं। हिंदी भाषा के क्षेत्र में अनुवादक, राजभाषा अधिकारी, विज्ञापन लेखन, संवाद लेखन, विज्ञापनों की पंच लाइन बनाना, रनिंग कामेंट्री सहित कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां रोजगार की बेहतर संभावनाएं हैं। जरूरत है हिंदी के प्रति सम्मान का भाव रखने की।भाषा का संस्कार परिवार से मिलता है। जरूरत इस बात की है कि अभिभावक बच्चों में बचपन से हिंदी के संस्कार पैदा करें। इसके लिए उत्कृष्ट साहित्य को बाजार में लाना होगा। हिंदी हमारी संस्कृति की भाषा है।

तीन बार से ज्यदा नहीं दे पाऐंगे नीट का एग्जाम ,उम्र पर लगी बंदिश जाने और क्या क्या हुए बदलाव


देश के सरकारी, गैर सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस और बीडीएस में एडमिशन के लिए प्रस्तावित नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट (नीट) अब तीन बार ही दिया जा सकेगा। यह व्यवस्था शैक्षिक सत्र 2017-18 से ही लागू कर दी गई है। नियम सभी संवर्ग (सामान्य, ओबीसी, एससी, एसटी) के स्टूडेंटों पर लागू होगा। इससे पहले टेस्ट देने की कोई सीमा नहीं थी। पेपर देने की न्यूनतम उम्र 17 और अधिकतम उम्र 25 वर्ष रखी गई है। आरक्षित श्रेणी के स्टूडेंटों को पांच साल की छूट मिलेगी।

नीट 2017-18 के ऑनलाइन फार्म 31 जनवरी से शुरू होकर एक मार्च तक भरे जा सकेंगे। एग्जाम सात मई को है। इसका ब्योरा वेबसाइट cbseneet.nic.in पर उपलब्ध है। मेडिकल का सिंगल एंट्रेंस टेस्ट सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद शैक्षिक सत्र 2016-17 से कराया गया। पहली बार हुए एंट्रेंस टेस्ट में पेपर देने की कोई सीमा नहीं थी। इस बार से शेड्यूल में तीन बार ही पेपर देने की अनिवार्यता लागू कर दी गई। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) और सीबीएसई ने सर्कुलर जारी कर कहा है कि इस व्यवस्था से चिकित्सा शिक्षा और उसके शोध की गुणवत्ता में सुधार होगा। युवा और तेजतर्रार स्टूडेंट सेलेक्ट होंगे। 

सीपीएमटी में नहीं थी समयसीमा, उम्र की बंदिश
नीट का पेपर दूसरी बार कराया जा रहा है। इससे पहले यूपी के सरकारी, गैर सरकारी मेडिकल कॉलेजों की एमबीबीएस और बीडीएस की सीटें कंबाइंड प्री मेडिकल टेस्ट (सीपीएमटी) से भरी जाती थीं। सीपीएमटी में उम्र और पेपर देने की समयसीमा नहीं थी। स्टूडेंट इंटरमीडिएट (12वीं) के बाद बीएससी में एडमिशन लेते थे और मेडिकल प्रवेश परीक्षा की कोचिंग करते रहते थे। अब मेडिकल का सिंगल एंट्रेंस टेस्ट तीन बार दिया जाएगा। पहला मौका इंटरमीडिएट (12वीं) की पढ़ाई के साथ और दो मौके बाद में मिलेंगे।  

डेबिट, क्रेडिट कार्ड से जमा करें फीस
सामान्य, ओबीसी स्टूडेंटों के आवेदन फार्म भरने की फीस 1400, एससी, एसटी और फिजिकली हैंडीकैप्ड की 750 रुपये है। डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, नेट बैंकिंग और ई-वॉलेट से फीस जमा करने की सुविधा दी गई है।

आधार नंबर जरूरी
ऑनलाइन फार्म भरने में आधार नंबर की अनिवार्यता की गई है। कहा गया है कि जिन स्टूडेंटों के पास आधार नंबर नहीं है, वे सीबीएसई के निर्धारित सेंटर से आधार कार्ड बनवाए जा सकते हैं।

पूछे जाएंगे 180 क्वेश्चन
नीट में फिजिक्स, केमिस्ट्री और बायोलॉजी (जूलोजी, बॉटनी) के 180 क्वेश्चन पूछे जाएंगे। पेपर सुबह की पाली में 10 बजे से एक बजे तक होगा। 

जेईई मेन में तीन बार का मौका
एनआईटी, ट्रिपल आईटी और जीएफटी के ज्वाइंट एंट्रेंस एग्जाम (जेईई) मेन का पेपर इंटरमीडिएट की पढ़ाई के साथ और बाद में तीन बार दिया जा सकता है। बीटेक या फिर बीई में एडमिशन के लिए फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथमेटिक्स का पेपर देना पड़ता है। इसी मानक से मेरिट लिस्ट जारी और काउंसलिंग कराकर सीटें भरी जाती हैं। 

जेईई एडवांस में सिर्फ दो मौके
आईआईटी में एडमिशन के ज्वाइंट एंट्रेंस एग्जाम (जेईई) एडवांस के पेपर दो बार दिए जा सकते हैं। एक मौका इंटरमीडिएट (12वीं) की पढ़ाई के साथ मिलता है। दूसरा मौका इंटरमीडिएट की परीक्षा पास करने के बाद। इसके बाद आवेदन फार्म स्वीकार नहीं किए जाते हैं। बीटेक, बीई, बी. आर्किटेक्चर या फिर बी. प्लानिंग में एडमिशन के लिए फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथमेटिक्स का पेपर देने पड़ते हैं।

Monday, February 20, 2017

कंप्यूटर हार्डवेयर के क्षेत्र में कॅरियर की अपार संभावनाए


मौजूदा दौर में कंप्यूटर के बिना किसी भी काम की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। आने वाले समय में इसकी जरूरत और बढ़ेगी। जैसे-जैसे कंप्यूटर पर निर्भरता बढ़ेगी, उसी अनुपात में इसके रख-रखाव के लिए बेहतर प्रोफेशनल्स की डिमांड भी बढ़ेगी। छात्र कंप्यूटर हार्डवेयर का कोर्स करके अपना कॅरियर बना सकते हैं। पिछले दो दशक में अगर किसी क्षेत्र में सबसे ज्यादा विकास और कामकाज को लेकर निर्भरता बढ़ी है तो वह कंप्यूटर है। दरअसल कंप्यूटर आज हर एक की जिंदगी में इस तरह से पैठ बना चुका है कि इसके बिना कोई काम नहीं हो सकता। यह संभव है कि आपको कंप्यूटर का संचालन करना नहीं आता हो लेकिन समय पड़ने पर इसे सीखना आवश्यक होता जा रहा है। ऐसे में कंप्यूटर का रख-रखाव भी अहम हो जाता है। जब भी कभी इसमें खराबी आ जाती है तो इसे ठीक करने का काम कंप्यूटर हार्डवेयर प्रोफेशनल्स करते हैं।

कंप्यूटर हार्डवेयर क्या है--
कंप्यूटर के कलपुर्जों को सम्मिलित रूप से हार्डवेयर कहा जाता है। हार्डवेयर तकनीक के अंतर्गत इसके निर्माण और रख-रखाव की जानकारी दी जाती है। इसे दो भागों में बांटा जा सकता है। कार्ड लेवल और चिप लेवल। दरअसल, सभी कंप्यूटर उपकरणों में कई तरह के कार्ड लगे होते हैं, जिनमें कई चिप होती हैं। पहले किसी भी चिप में कोई खराबी होने पर पूरे कार्ड को बदल दिया जाता था। इसे ‘कार्ड लेवल हार्डवेयर तकनीक' कहते हैं। इसमें लगने वाले कार्ड काफी महंगे होते हैं, इस कारण यह तकनीक काफी महंगी है। अब जब से कार्ड में लगे चिप को बदलने की तकनीक विकसित हो चुकी है तो कंप्यूटर में इससे संबंधित किसी भी तरह की खराबी आने पर कार्ड में लगे चिप को बदलकर ही खराबी दूर कर दी जाती है। कार्ड के मुकाबले चिप काफी सस्ती पड़ती है। इसके कारण यह तकनीक काफी लोकप्रिय है।

योग्यता--
कई पॉलिटेक्निक और निजी संस्थानों द्वारा चिप लेवल हार्डवेयर में डिप्लोमा का पाठ्यक्रम भी कराया जाता है। डिप्लोमा पाठ्यक्रमों की अवधि एक से तीन वर्ष के बीच होती है। इन कोर्सेज में प्रवेश के लिए योग्यता बारहवीं पास है, जबकि पॉलिटेक्निक में दसवीं के बाद ही प्रवेश लिया जा सकता है। अधिकतर जगहों पर दाखिला प्रवेश परीक्षा के आधार पर ही होता है। कुछ निजी संस्थान बारहवीं के अंकों के आधार पर भी प्रवेश देते हैं। इस पाठ्यक्रम में सबसे पहले छात्रों को मूलभूत सिद्धांतों से परिचित कराया जाता है। इनमें कैपिसीटर, डायोड, ट्रांसफॉर्मर, आईसी और चिप की जानकारी दी जाती है। इसके बाद डिजिटल डिवाइस एसेंबलिंग, ड्राइव पावर सप्लाई, मॉनिटर, मदर बोर्ड, प्रिंटर, यूपीएस आदि की विस्तृत जानकारी दी जाती है। इसके अलावा छात्रों को विंडोज ऑपरेटिंग सिस्टम, नेटवर्किंग, लैन व वैन के बारे में भी जानकारी दी जाती है।

संभावनाएं---
कंप्यूटर और उसके उपभोक्ताओं की लगातार बढ़ती संख्या के साथ ही हार्डवेयर इंजीनियरों की मांग भी काफी तेजी से बढ़ी है। निजी संस्थानों और कार्यालयों में कंप्यूटर के बिना काम करने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। कंप्यूटर में थोड़ी-सी गड़बड़ी लाखों का नुकसान करा सकती है, इसलिए निजी कंपनियों और सरकारी कार्यालयों में पर्याप्त संख्या में हार्डवेयर प्रोफेशनल नियुक्त किए जाते हैं। घरों, दुकानों आदि में कंप्यूटर के बढ़ते प्रयोग के कारण स्वतंत्र रूप से रिपेयरिंग का काम करके काफी आमदनी की जा सकती है। आप हार्डवेयर अपग्रेडेशन में भी टेलीकॉम, मोबाइल और कंप्यूटर से संबंधित इलेक्ट्रिॉनिक गुड्स के क्षेत्र में काम कर सकते हैं। साथ ही अगर आप नौकरी नहीं करना चाहते हैं तो खुद का व्यवसाय भी कर सकते हैं। यदि कुल मिलाकर कहा जाए तो कंप्यूटर हार्डवेयर में अवसरों की कोई कमी नहीं है।

Sunday, February 19, 2017

# परीक्षाओं के दौरान तनाव से मुक्त रहें ,मिलेंगे शानदार नतीजे #

     इन दिनों परीक्षाओं का दौर प्रारंभ हो गया है और तकरीबन सारी कक्षाओं के छात्र-छात्रा एग्जाम फोबिया से बुरी तरह ग्रसित नजर आते हैं। जबकि परीक्षा के दौरान बच्चों का तनाव मुक्त एवं खुशमिजाज रहना बेहद जरूरी होता है।

        परीक्षा के दौरान सारी बातें एक डेढ़ सप्ताह के अंदर ही घटित होने वाली होती हैं, इसीलिए बच्चे तनाव में आ जाते हैं। अगर वे अपनी समस्या का समय प्रबंधन कर लें तो उन पर तनाव कतई हावी नहीं होगा।

        परीक्षाओं की तैयारी के दौरान टाइम मैनेजमेंट बेहद अहम होता है। इसके तहत छात्र-छात्राओं को परीक्षा के कार्यक्रम के मुताबिक स्टडी का वक्त तय कर लेना चाहिए। इसके लिए वे अपने शिक्षक, माता पिता या फिर सीनियर कक्षा के छात्रों से मदद ले सकते हैं।

प्रमुख बातें--
1-  तय करें स्टडी का वक्त
2-  रहें अनुशासित व ध्यान रखें केंद्रित
3-  पढ़ाई के दौरान ब्रेक ले
4-  शोरगुल वाले माहौल से स्वयं को रखें अलग
5-  विश्राम के वक्त सुनें मनपसंद संगीत
6-  योगा व मेडिटेशन से भी मिल सकती है मदद
7-  लें अल्प भोजन, करें गरिष्ठ खाने से परहेज

उलझन भरी बातों से स्वयं को रखें अलग--
        परीक्षा के दौरान छात्रों को साल-दो साल की पढ़ाई के दौरान सीखी गयी बातों को महज तीन घंटों में बेहतर तरीके से प्रस्तुत करना होता है। जाहिर है कि कहीं से किसी समझौते की गुंजाइश नहीं होती है। इसीलिए परीक्षार्थियों का एकाग्रता उच्च स्तर पर रहना चाहिए। यह तभी हो सकता है जब आप स्वयं को अपने लक्ष्य पर पूरी तरह केंद्रित रखे,
      परीक्षाओं के दौरान छात्र-छात्राओं के बीच तनाव एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन वे इसके लिए अपनी तैयारियों को टाइम-बाउंड बना कर बेहतर नतीजे प्राप्त कर सकते हैं। परीक्षा देते वक्त किसी प्रकार के मोड़ व तनाव से दूर रहना भी अत्यंत आवश्यक है।

अगर आप भी चाहते हैं भारत के टॉप कालेजों में MBA करना, तो जानिये इनके खर्च के बारे मे

अगर आप भी भविष्य में आगे किसी बड़ी कंपनी के सीईओ बनने का सपना देख रहे हैं, तो आप के पास मैनेजमेंट की डिग्री होना बहुत जरुरी है. अगर आप सोचते हैं कि साधारण एजुकेशन है, तो आप को इसका कोई फायदा नहीं होने वाला है. साधारण एजुकेशन तो उन लोगों के लिए है जिनके पिता या कोई ख़ास किसी बड़ी कंपनी में बड़े पद पर काम रहे हों.

वैसे तो भारत में ऐसी हजारों संस्थाएं हैं, जहाँ आप बिजनेस मैनेजमेंट की पढ़ाई कर सकते हैं, लेकिन आप को ये जानना जरुरी है, कि कहाँ पर कितना खर्च आयेगा. आइये जानते हैं भारत के टॉप कालेजों में एमबीए पर कितना खर्च आएगा……………..

1. इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट, कोलकाता

पीजीडीएम: इस कोर्स को करने के लिए आप को 24 महीने देना होगा और साथ ही आप को इसके लिए 19 लाख की रकम भी चुकानी होगी.

आईआईटी खड़गपुर
पीजी डिप्लोमा: इस के लिए आप को 24 महीने का समय और 17 लाख रूपये अदा करना होगा, तभी आप इस डिग्री को ले सकते हैं.
पीजीपीईएक्स-एक्जीक्यूटिव:
समय: 12 महीने
फीस: 22 लाख

2. जेवियर लेबर रिसर्च इंस्टिट्यूट स्कूल ऑफ़ मैनेजमेंट, जमदेशपुर

पीजीडीएम (बिजनेस मैनेजमेंट)
समय: 2 साल
फीस: 16.8 लाख
पीजीडीएम (जनरल मैनेजमेंट)
समय: 2 साल
फीस: 16 लाख रूपये.

3. यूनिवर्सल बिजनेस स्कूल, मुंबई

पीजीडीएम
समय: 2 साल
फीस: 7.98 लाख रुपये.

4. एसपीजेआईएमआर, मुंबई

पीजीडीएम
समय: 1 साल
फीस: 16.25 लाख रुपये.

5. इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट टेक्नोलॉजी, गाजियाबाद

पीजीडीएम
समय: 2 साल
फीस: 16.5 लाख

6. फैकल्टी ऑफ़ मैनेजमेंट स्टडीज, दिल्ली

एमबीए फुल टाइम
समय: 2 साल
फीस: 10 हजार सालाना

60 फीसद विद्यार्थी एग्जाम फोबिया के शिकार

फरवरी शुरू होने के साथ ही परीक्षाओं का तनाव भी विद्यार्थियों को परेशान करने लगा है। इस समय रीजन में 60 फीसद विद्यार्थी एग्जामिनेशन फोबिया से ग्रस्त हैं। यह हम नहीं बल्कि सीबीएसई द्वारा शुरू की गई एग्जाम हेल्पलाइन नंबर पर आ रहे मामलों के आकड़े बता रहे हैं।
सीबीएसई की ओर से नियुक्त काउंसलर के मुताबिक, रोजाना आ रही कॉल्स में लगभग 45 से 50 फीसद विद्यार्थी प्रोकैस्टिनेशन डिसऑर्डर का शिकार हैं, तो वहीं 10 परसेंट बच्चे एग्जाम फोबिया की चपेट में आ गए हैं। सीबीएसई ने विद्यार्थियों व उनके अभिभावकों के लिए 9 फरवरी से 29 अप्रैल तक काउंसलिंग सेल स्थापित किया है। जहां वह टोल फ्री नंबर 1800118004 व ऑनलाइन भी काउंसलिंग करवा सकते हैं। सीबीएसई ने परीक्षा से संबंधित तनाव को दूर करने के लिए देश भर से 90 लोगों का पैनल बनाया गया है। जो कि विद्यार्थियों व उनके अभिभावकों की परीक्षाओं से जुड़ी मानसिक समस्या से निजात दिला रहे हैं। पैनल में प्रिंसिपल, प्रशिक्षित, काउंसलर, मनोवैज्ञानिक व विशेष प्रशिक्षक हैं जो 9 फरवरी से 29 अप्रैल तक विद्यार्थियों व उनके अभिभावकों की हर समस्या का समाधान करेंगे।
छह दिन में ही आए 600 से ज्यादा मामले
सीबीएसई ने 9 फरवरी से स्टूडेंट्स और पैरेंट्स के लिए फ्री काउंसलिंग हेल्पलाइन शुरू की है। इसके तहत छह दिन में ही विद्यार्थियों के तनावग्रस्त होने के करीब 600 मामले सामने आए हैं। इनमें अधिकतर केस पढ़ाई में मन ना लगने, ध्यान भटकने सहित एग्जाम फोबिया से जुड़े बताए गए हैं। इतना ही नहीं कई विद्यार्थी तो अपने विषयों से संबंधित सवाल भी हेल्पलाइन पर पूछ रहे हैं। आगे करियर सेलेक्शन को लेकर भी बहुत से विद्यार्थी तनाव में हैं।
टालमटोल की स्थिति हो सकती है खतरनाक: डॉ. जसबीर
मनोवैज्ञानिक व काउंसलर डॉ. जसबीर का कहना है कि अक्सर विद्यार्थी पढ़ाई को लेकर टालमटोल की स्थिति में रहते हैं। इस प्रॉब्लम को प्रोक्रैस्टिनेशन ने नाम से जाना जाता है। इसमें देखने को आता है कि पढ़ाई को लेकर विद्यार्थी अक्सर बहाने बनाते हैं। बार- बार कहने पर भी टालने की कोशिश करते हैं। पैरेंट्स इसे उनकी शरारत सोच कर जबरदस्ती करने लगते हैं। एक्सपर्ट्स की मानें तो बच्चे की टालने की यह आदत गंभीर बीमारी का रूप भी ले सकती है। एग्जाम टाइम में यह प्रॉब्लम प्रेशर के साथ ज्यादा बढ़ने लगती है। इसी का नतीजा है कि एग्जाम करीब होने के चलते रीजन में करीब 60 फीसद विद्यार्थी किसी न किसी तरह की मानसिक समस्या की चपेट में आ गए हैं।
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रिजल्ट का डर, भूलने की आदत जैसी समस्याओं के आ रहे फोन: डॉ. सोना
हेल्पलाइन पर जो फोन कॉल्स आ रही हैं उनमें ज्यादातर विद्यार्थी परीक्षा का दबाव को महसूस कर रहे हैं। बच्चों में रिजल्ट का डर, भूलने की आदत, कंफ्यूजन, पढ़ाई में मन न लगना जैसे मामले आ रहे हैं। स्टूडेंट्स अगर एग्जाम टाइम को मैनेज करके स्टडी करें तो प्राब्लम नहीं होगी। अभिभावक भी बच्चों को समझें व उन्हें सहयोग दें।
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स्कूलों में भी हो रही है काउंसलिंग
बोर्ड परीक्षाओं को लेकर एपीजे स्कूल, इनोसेंट हा‌र्ट्स स्कूल, एमजीएन पब्लिक स्कूल, कैंब्रिज इंटरनेशनल, सीजेएस पब्लिक स्कूल, स्वामी संत दास स्कूल सहित अन्य दर्जन भर स्कूलों द्वारा विद्यार्थियों में तनाव दूर करने के लिए स्कूल स्तर पर भी काउंसलिंग की जा रही है।

अंग्रेजी की तैयारी पर करे फोकस

मैट्रिक परीक्षा को लेकर बच्चों के मन में सवालों का उठना लाजमी है। परीक्षा के समय निर्धारित समय सीमा के दौरान सवालों को फटाफट हल करना अहम होता है। परीक्षा की सफलता के लिए जरुरी बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। सजगता के साथ सवालों को हल करने पर अधिक ध्यान देना होगा। ऐसे समय में गुरुजनों का मार्गदर्शन की जरूरत होती है। परीक्षार्थियों के मार्गदर्शन के लिए तहत प्रस्तुत है मैट्रिक परीक्षार्थियों के लिए  परामर्श।
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आत्मविश्वास के साथ करें तैयारी
-- परीक्षार्थियों को अंग्रेजी पर पकड़ मजबूत करने का प्रयास करना चाहिए।
-- परीक्षा से पूर्व किसी भी कमी को दूर करने का भरसक प्रयास होना चाहिए।
-- अंग्रेजी विषय अहम हो जाता है। परीक्षा से पूर्व ग्रामर बुक पर प्रैक्टिस करना जरुरी होता है।
-- प्रैक्टिस से टॉपिक पर कामयाबी में सफलता मिलेगी। अंग्रेजी पर कमांड के लिए मेहनत से घबराने की जरुरत नही है।
-- निरंतर अभ्यास से तैयारी में आसानी होगी और पढ़ने में मन लगा रहेगा।
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जरूरी टिप्स
- अच्छी पढ़ाई मिलने वाले को¨चग संस्थानों का चयन करना चाहिए।
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अनुभवी शिक्षकों का चयन कर नोट्स एवं चुने हुए प्रश्नों को बेहतर ढंग से तैयारी करें।
- किसी भी तैयारी के लिए आत्मबल को ऊंचा रखें।
- पढ़ाई के
साथ-साथ नियमित दिनचर्या रखें।
- सात-आठ घंटे की नींद अवश्य लें।
- परीक्षा की तैयारी को बोझिल नहीं मानते हुए सहज भाव से लेना चाहिए।

आ रही है परीक्षा की घड़ी, पर डरें ना बल्कि ऐसे करें खुद को तैयार

परीक्षा के नाम भयभीत होने वाले छात्र कैसे इससे मुक्‍त होकर परीक्षा में उम्‍दा प्रदर्शन कर सकते हैं, इस संदर्भ में बता रहे है  कुछ मनोचिकित्सक...

जैसे ही विभिन्न शैक्षिक बोड्स की परीक्षाएं शुरू होती हैं, छात्रछात्राओं में ‘परीक्षा के खौफ’ के लक्षण सिर चढ़कर दिखाई देने लगते हैं। इस स्थिति के कारण पढ़ने वाले बच्चों को अक्सर गर्दन पर खिंचाव की वजह से दर्द, कंधों में जकड़न और अपर्याप्त नींद आदि समस्याएं उत्पन्न होने लगती हैं। परीक्षा का समय शायद छात्र-छात्राओं की उम्र के दौर का सबसे तनावपूर्ण समय होता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि परीक्षाओं के परिणाम पर ही छात्र-छात्राओं का भविष्य निर्भर करता है।

उबरें पढ़ाई के दबाव से----
आज छात्र-छात्राओं को उच्चस्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं का अधिक सामना करना पड़ता है। वे अपने स्कूल से संबंधित कार्यों में दिन का लगभग एक तिहाई समय व्यतीत करते हैं, जबकि लड़कियां लड़कों से ज्यादा समय बिताती हैं। स्कूल का कार्य कुछ नकारात्मक स्थितियां भी पैदा करता है। जैसे बहुत ज्यादा सामाजिक चिंताएं और
चयन करने की क्षमता में कमी आदि। ये नकारात्मक प्रभाव होमवर्क के दौरान ज्यादा सक्रिय होते हैं। जो बच्चे होमवर्क नियमित रूप से करते हैं, वे भावनात्मक और अन्य समस्याओं का सामना कम करते हैं। इसलिए
इम्तहान से पहले पढ़ाई के दौरान बच्चों को नियमित रूप से होमवर्क करना चाहिए।

तनाव पर नियंत्रण

तनाव एक ऐसी बेचैनी होती है, जो हर किसी को अलग-अलग तरह से प्रभावित करती है चाहे वह कोई छात्र-छात्रा हो या कोई वयस्क। साधारणत: पढ़ने वाले बच्चों के लिए तनाव के कई कारण हो सकते हैं। जैसे अपशब्द, उपेक्षा, गरीबी, परीक्षा में असफलता या बीमारी आदि। हालांकि कुछ हद तक तनाव लाभदायक हो सकता है, क्योंकि सीमित तनाव से बच्चों को पढ़ाई के प्रति सचेत करने में मदद मिलती है। अक्सर एक छात्र-छात्रा में तनाव की कई प्रतिक्रियाएं होती हैं। 
जैसे वे अपने प्रति लोगों से ज्यादा सावधानी की अपेक्षा रखता है, मूड में बदलाव आना, कुछ कामों को करने से टालना या अकेले रहना, स्कूल जाने से मना करना, स्कूल का काम न करना, सोने में दिक्कत होना या शारीरिक कष्ट होना जैसे सिरदर्द या हाजमे से संबंधी समस्याएं आदि। इन समस्याओं के निवारण में अभिभावकों के सहयोग की जरूरत है।

अपेक्षाओं का अधिक भार न डालें:

अभिभावक अपने बच्चों को सफल देखना चाहते हैं और उनके शैक्षिक प्रदर्शन से बहुत ज्यादा अपेक्षाएं रखते हैं, ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि क्या हमारी अपेक्षाएं बहुत ज्यादा हैं? अभिभावकों को बच्चों की क्षमता और उनकी दिलचस्पी को समझना चाहिए और उन पर अपनी अपेक्षाएं पूरी करने का दबाव नहीं डालना चाहिए।

बच्चों की सुनें

आपका बेटा या बेटी जब वह किसी तनावपूर्ण स्थिति के बारे में बता रहा हो, तो आप एक अच्छे श्रोता बनें और अपने बच्चों को यह आश्वस्त करें कि आपका उनके साथ पूरा सहयोग और प्यार साथ है।

समस्याओं को सुलझाने का तरीका सिखाएं :

बच्चों को बड़ी समस्याओं को आसानी से सुलझाने का तरीका सिखाने में मदद करें। उनके साथ बात करें और उन्हें बताएं कि आपने अपनी तनावपूर्ण स्थितियों का सामना किस प्रकार किया था।

अतार्किक सोच से सचेत रहें:
कई बार हम बच्चों को इस प्रकार के वाक्यों को कहते हुए सुनते हैं कि,‘मुझे अच्छे नंबर लाने हैं, अन्यथा दोस्त मेरा मजाक उड़ाएंगे। इसी तरह यदि मैं परीक्षा में अच्छे नंबर नहीं लाया, तो मुझे पता है कि मेरे माता-पिता कितने निराश होंगे।’ यदि आपको ऐसा लगे कि तनाव आपके बच्चों के शब्दकोश
का एक हिस्सा बनता जा रहा है, तो उनसे सकारात्मक वार्तालाप करें और उनकी मदद करें।

ध्यान और योग---
योग आप के बच्चों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को सुधारने की एक बेहतर विधि साबित हो सकता है। ध्यान और योग प्रभावकारी विधिया हैं, लेकिन ये उन बच्चों पर ज्यादा असर करती हैं, जिनके माता-पिता अपने बच्चों से खुलकर बात करते हैं और तनावपूर्ण स्थिति में उनकी मदद करते हैं।
(डॉ.गौरव गुप्ता, वरिष्ठ मनोरोग विशेषज्ञ )

लक्ष्य अवश्य बनाएं
परीक्षा के डर से पढ़ना, पढ़ने के लिए स्थायी तौर पर प्रेरणा नहीं बन सकता। दीर्घ-काल में अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए पढ़ने या अध्ययन की प्रवृत्ति स्टूडेंट्स को कहीं ज्यादा प्रेरणा प्रदान कर सकती है। हो सकता है कि अनेक छात्रों ने अभी यह निर्णय न लिया हो कि वे भविष्य में क्या करना या बनना चाहते हैं, पर वे सभी सफल
तो होना ही चाहते हैं। जैसे, दीर्घकालिक लक्ष्य (लांग टर्म गोल) से संबंधित विजन दस साल बाद का हो सकता है। इस विजन को सकारात्मक होना चाहिए, जो सफलता से जुड़ा हो। आप उस सकारात्मक विजन को साकार करने
के लिए अभी से प्रयास करें और उसे अपनी प्रेरणा बनाएं। याद रखें सफलता सिर्फ अच्छे नंबरों को प्राप्त करना भर नहीं है। सफलता जीवन को इस तरीके से जीना है कि आप अपने जीवन की समस्याओं को भी पहचान सकें। आपका विजन आपको पढ़ने के लिए लक्ष्य प्रदान करेगा। याद रखें, एग्जाम न तो जिंदगी की परिभाषा है और न ही सफलता की। इस तरह की संतुलित सोच आपको परीक्षा में उम्दा प्रदर्शन के लिए प्रेरित करने में सक्षम है। इससे परीक्षा का खौफ खत्म हो जाता है।
(डॉ.अचल भगत, मनोरोग विशेषज्ञ,)

अभिभावक ध्यान दें

- पढ़ाई के दौरान बच्चा यदि थोड़ी देर के लिए फोन करता है, गेम्स खेलता है या टी.वी. देखता है, तो कुछ वक्त के लिए उसे ऐसा करने दें। इससे दिमाग में ताजगी आती है और दोबारा पढ़ने बैठने पर बच्चा बेहतर रूप से एकाग्रचित्त होकर पढ़ पाता है।
- विशेषकर परीक्षाओं के दिनों में बच्चे की पढ़ाई व उसकी तैयारी की तुलना दूसरे बच्चों जैसे उसके भाई- बहनों,पड़ोसियों के बच्चों या उसके दोस्तों (जो अच्छी तरह से पढ़ाई कर रहे हों) से न करें। इससे बच्चा हतोत्साहित होता है।
- परीक्षा के परिणाम व नंबरों से जुड़ी अपेक्षाओं को अभिभावक बच्चे पर न थोपें। इससे बच्चे में विफलता का भय पनपता है और उसका आत्म-विश्वास डगमगाने लगता है।
- यदि बच्चा हताशा में आकर आपसे कहता है कि उसकी तैयारी बेकार है और वह फेल होने वाला है, तो उसकी पूरी बात सुनें। इसके बाद अपनी ओर से उसकी पढ़ाई व तैयारी को लेकर संतोष व विश्वास जताएं।
- बच्चे को आश्वस्त करें कि हर अच्छी व बुरी स्थिति में हम उसके साथ हैं।
(डॉ.उन्नति कुमार, मनोरोग विशेषज्ञ)

10 वी के बाद कौन-सा कोर्स करे, कौन-सा सब्जेक्ट ले, क्या करे ?

हमारे देश में दसवी क्लास तक सभी स्टूडेंट्स को एक जैसा सब्जेक्ट पढाया जाता है लेकिन इसके बाद विद्यार्थी को अपने इंटरेस्ट के हिसाब से या फिर आ...